Tuesday, March 31, 2015

रील में दिखती रियल की झलक


फिल्में, मनोरंजन का एक साधन| जब अपने पसंदीदा हीरो या हीरोइन की कोई भी नयी फिल्म आने वाली होती है तो उसका इंतजार बहुत पहले से ही शुरू हो जाता है| फिल्म सिनेमाघर में लगती है, लोग जाते है और फिर निकलते वक़्त उस फिल्म का कोई सीन डिस्कस कर रहे होते है या कहानी पर आपनी-अपनी राय दे रहे होते है|

अक्सर कुछ फिल्मों को देख ऐसा लगता है मानों उनकी कहानियाँ हमारी ही जिंदगी के पन्नो से चुराई गयी हो जिनपर सिर्फ और सिर्फ हमारा ही कॉपीराइट हो| कितनी बार मैंने दुसरो से सुना है कि मुझे वह फिल्म सिर्फ इसलिए पसंद है क्योंकि मेरी जिंदगी के कुछ हिस्से उस फिल्म में दिखाए गये है| ऐसी कितनी ही बातें जो मैं सोचता हूँ पर बयाँ नहीं कर सकता, फिल्में कितनी आसानी से दिखा जाती है और जब दिखाती है तब मैं सोचता हूँ, क्या ये इत्तेफाक है| जहाँ और लोग बहुत ही मजे और चाव से किसी फिल्म को देखते है और ठहाके लगाते है वही दूसरी ओर कोई एक इंसान अचम्भे और सोच में बैठा रहता है की मानो उसकी जिंदगी उसी के सामने बड़े परदे पर चल रही हो| ये भी एक अजीब बात ही है की जब कभी भी कोई इन्सान कोई बड़ी बात करता है तब हम ही उससे कहते है “ज्यादा फिल्में देखता है तो डायलोग मारना सीख गया है”| डायलोग क्या होते है और क्यों होते है, क्या फिल्मों में जो बातें होती है हमारी निजी जिंदगी से नहीं जुडी होती? चलिए, आपको लेकर चलता हूँ एक ऐसी कहानी की तरफ जो लगती तो रील की है पर है शुद्ध रियल|

यह कहानी है मनोज की, मेरा एक जानकार| लम्बा है, साँवला है, भूरी आँखें हैं और मस्तानी चाल| मनोज अपनी धुन में रहने वाला और जिंदगी को अपने ही अंदाज़ में जीने वाला लड़का है| उम्र होगी करीबन कोई 23 साल| उसकी एक खासियत है, दुनिया क्या बोलती है उसे कोई फर्क नहीं पड़ता| घर उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के पुराने मोहल्ले में बसा है और दिल दुनिया को देखने की चाह में| घर में बाबा, माँ, एक भाई है और हाँ, साथ में एक छोटा लड़का भी है जो उनके घर रह कर पढता है| मनोज कोई बहुत रईस खानदान से नहीं है और ना ही उसके बाबा कोई बहुत पैसे वाले है पर फिर भी लोगों में उनकी एक अच्छी पकड़ है| उसके बाबा कहते है उन्होंने पैसे नहीं कमाए है पर इज्ज़त जरूर कमाई है| जब मनोज छोटा था तब उसके बाबा लखनऊ में एक बहुत बड़ी कंपनी में काम करते थे| मनोज अपने भाई के साथ लखनऊ के ही स्कूल में पढता था| फिर एक दिन मनोज के बाबा अपने पिता के कहने पर लखनऊ छोड़ फैजाबाद में आकर बस गये| चुकि बाबा लखनऊ में एक बड़ी पोस्ट पर थे, फैजाबाद में उन्हें वह पोस्ट नहीं मिल पा रही थी| थकहार कर उन्होंने फैजाबाद मे ही कम सैलरी पर एक कंपनी ज्वाइन कर ली| मनोज और उसके भाई का एडमिशन फैजाबाद के ही किसी स्कूल में करा दिया गया| लखनऊ और फैजाबाद के बच्चों में बहुत अंतर था| उसे यहाँ दुसरे बच्चों से घुलने मिलने में बहुत परेशानी हो रही थी| मनोज अपनी माँ से अक्सर कहता था की उसे यहाँ की बातें समझ नहीं आती| पढाई में भी ध्यान नहीं लगा पा रहा था| नतीजा यह हुआ की, 4 साल हर एग्जाम में सबसे कम मार्क्स आये| 2 बार फाइनल एग्जाम में फेल किया पर उसके बाबा के कहने पर प्रिंसिपल ने अगली क्लास में बैठने दिया| वह हमेशा खामोश रहा करता था| उसे चीजों को समझने में बहुत मुश्किलें आ रही थी 

घर पर भी कुछ ख़ास ठीक हालात नहीं थे| मनोज के बाबा एक कंपनी को छोड़ दुसरे और फिर उसे छोड़ किसी तीसरे कंपनी को ज्वाइन कर लेते| अब तो बस यही सुनने को मिलता था की बस कुछ दिन और फिर सब ठीक हो जाएगा| दिन बीते फिर महीने और फिर साल, परिस्थति थोड़ी ठीक होती दिखती की दूसरी प्रॉब्लम अपना मूह फाड़ कर खडी हो जाती| घर के बगल में जिनका घर था मनोज अक्सर उनके घर जाया करता था| एक बार उस घर में कुछ रूपए गायब हुए, शक की सीधी सुई मनोज की तरफ जा कर रुक गयी| कुछ लोगों ने इस बात की शिकायत मनोज के बाबा से कर दी और बाबा ने बिना कुछ जाने समझे मनोज को मारना शुरू कर दिया| मनोज कहता रहा उसने कुछ नहीं किया पर उसकी एक न सुनी गयी| अगले कुछ महीनो तक यह सिलसिला सा बन गया था उसके साथ| कुछ भी होता, गलती किसी की भी होती, सजा का हकदार सिर्फ मनोज होता| उसके घर में कोई शादी थी शायद, बाहर से कुछ मेहमान आये थे| मनोज ने अपने किसी रिश्तेदार को किसी बात पर चिल्ला कर बोल दिया था, अगले ही दिन उस रिश्तेदार ने किसी झूठी बात पर मनोज की शिकायत उसके बाबा से कर दी| रिश्तेदारों से भरे घर में, बीच आँगन में उसे बहुत बुरी तरह मारा गया था| शायद मनोज के बाबा और माँ को इस तरह की सजा इसलिए पसंद थी कि आगे चलकर मनोज कोई गलती ना करे| पर एक वैध सजा के लिए वैध गलती का भी होना बहुत जरूरी है| ऐसा नहीं था मनोज का परिवार उससे प्यार नहीं करता था| पर जब कभी भी ऐसी बातें होती थी तब उसके बाबा को लगता था मनोज कही गलत रास्ते पर ना चला जाए| इसलिए गलती की सजा तुरंत ही दे दी जाती थी| पर यह कौन सी सजा थी जिसकी गलती का ही पता न था| खैर, दिन बीतते चले गये और साथ ही साथ मनोज ने लोगों को पहचानना शुरू कर दिया| उसे अब पता था रिश्ते उन्ही से निभाये जा सकते थे जो रिश्तों को महसूस करता हो| घर में इतनी पैसों कि कमी को देख मनोज ने पैसों को भी तवज्जो देना छोड़ दिया था| मनोज ने फुटबॉल क्लब ज्वाइन कर लिया था| उसका सिलेक्शन फैजाबाद की फुटबॉल टीम के लिए कर लिया गया| धीरे धीरे घर की प्रोब्लेम्स भी कम होती चली गयी| मनोज ने कम उम्र में ही फुटबॉल में अपना अच्छा नाम कमा लिया था| साथ ही साथ मनोज को चित्रकारी का भी शौक था| लोगों ने आगे बढने का प्रोत्साहन दिया तो मनोज ने अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाई जिसे लोगों ने बहुत सराहा| बड़े बड़े अखबार मनोज के बारे में छापने लगे| उसकी एक एक पेंटिंग 10 से 15 हजार तक बिकने लगी| मनोज ने महसूस किया की कल तक जो रिश्तेदार उससे नफरत करते या उसे पसंद नहीं करते थे , वही आज दूसरों से मनोज का परिचय कराते वक़्त फक्र किया करते थे| इस वक़्त तक मनोज एक मस्त मौला लड़का बन चूका था| लोग उसकी तरफ आकर्षित होने लगे थे| आपनी बातों से अकसर वो लोगो को हसाया करता था|

अपना ग्रेजुएशन खत्म होने पर मनोज अलाहाबाद में आगे की पढाई करने आ गया| अलाहाबाद के लोग अपने ठाट-बाट और बोली के लिए काफी जाने चाहते है| चुकि हर तरफ बैंक में नौकरी को ले घमाशान युद्ध छिड़ा था| मनोज ने भी बैंक की तैयारी के लिए किसी क्लास में एडमिशन ले लिया| क्लास में पढाई के लिए कम और मस्ती कए लिए ज्यादा जाना जाता था वह| एक दिन मनोज को लगा उससे इस भेडचाल में काम नहीं होगा| उसने वह क्लास छोड़ दी| अलाहाबाद में ही उसकी मुलाकात एक आदमी से हुई| वह मनोज से काफी ज्यादा प्रभावित हुआ और साथ काम करने का ऑफर दिया| मनोज को शायद इसी वक़्त का इंतजार था| मनोज उस इन्सान के साथ इवेंट में काम करने लगा| कुछ दिन वहां काम करने के बाद मनोज को रेडियो पर काम करने का ऑफर आया| मनोज ने उस कंपनी को छोड़ रेडियो चैनल ज्वाइन कर लिया और उनके लिए लिखने लगा| मनोज को घुमने का बहुत शौक था| वह हमेशा इस शहर से उस शहर करता रहता| उसके लिए लोगों को समझना और नई चीज़ों को जान ना बहुत जरुरी सा काम था| मनोज ने अपना एक ग्रुप भी बनाया था जिनके साथ मिलकर वह नुक्कड़ नाटक किया करता था| चुकि चित्रकार था तो फैजाबाद की कल्चरल कमिटी का भी मेम्बर बना दिया गया था| एक गर्लफ्रेंड भी बनी थी उसकी पर ज्यादा दिन तक चला नहीं था रिश्ता उससे उसका| मनोज को यकीन था की रिश्तों को महसूस करने से ही रिश्ता चलता है| वह सब को साथ ले कर चलने पर यकीन रखता था| मनोज और उसके परिवार की लाइफ में अब सब कुछ ठीक चल रहा था की फिर से एक बात ने मनोज को जकड लिया| मनोज को अक्सर सीने में दर्द रहता था पर उसने कभी भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया| एक दिन उसने जब डॉक्टर को दिखाया तब उसे पता चला की उसके सीने में दर्द का कारण एक बिमारी थी| उसने पूरा चेक अप कराया तब पता चला की यह बिमारी उसके लिए खतरनाक हो सकती है| मनोज को दौड़ना और थका देने वाले कामों को करने से मना कर दिया गया था| मनोज ने सोचा की इस बिमारी का जिक्र घर पर ना किया जाए| देखते देखते 3 साल निकल गये, बिमारी और ज्यादा बढ़ गयी और साथ ही उसकी जिंदगी जीने का अंदाज़ भी| वह आगे की पढाई के लिए भोपाल चला गया| इतने सालों में उसने अब तक अपने घर वालों को अपनी बिमारी के बारे में नहीं बताया था| मनोज ने कभी भी अपने कॉलेज लाइफ को एन्जॉय नहीं किया था, पर भोपाल आने के बाद उसने यह कसर भी पूरी कर ली| भोपाल में उसे बहुत अच्छे लोग मिले| ऐसे लोग जिन्होंने उसे जिंदगी को नये सिरे से जीना सिखाया|

अभी हाल ही में मनोज से बात हुई, पता चला की बिमारी ने अपने पैर थोड़े और पसार लिए है| घूमना वह छोड़ना नहीं चाहता क्योंकि कल क्या हो जाए उसे नहीं पता और फिर बिस्तर पर बैठ कर किसी चीज़ पर रिग्रेट नहीं करना चाहता| मनोज कुछ दिन बाद अपने इलाज़ के लिए केरल जा रहा, जहा उसे हर्बल ट्रीटमेंट दिया जाएगा| मनोज ने अभी तक अपने घर वालों को अपनी बिमारी के बारे में नहीं बताया है|

जब भी उसकी स्टोरी के बारे में सोचता हूँ, ऐसा लगता है फिल्मों में हम अक्सर ऐसी स्टोरी देखते है जिसमे करैक्टर बुरे हालात को पार करते हुए कामयाबी को हासिल करता है और फिर कुछ ऐसा होता है जो उसकी पूरी जिंदगी बदलने का मद्दा रखती हो|

बहुत से लोग है जो मनोज की ही तरह जीना चाहते है, पर मेरी नज़र में मनोज की लाइफ को जीना बहुत मुश्किल है| वो कहते है ना “जो इंसान ऊपर से जितना ज्यादा खुश और जिंदादिल होता है, अन्दर से उतना ही डरा होता है”| मनोज के बारे में सोच मुझे ऐसा ही लगता है|

Tuesday, March 24, 2015

All the way to Assam: the inside story by Anurag Verma | Tripoto

All the way to Assam: the inside story by Anurag Verma | Tripoto

मानों कल ही की तो बात है


बालकनी में बैठ कर कुछ पढ़ने की कोशिश कर रहा था, किसी काम से साइड में रखे मोबाइल को हाथ में लिया तो दंग रह गया| डिस्प्ले पर समय रात के 2 बजे का दिखा रहा था| हैरानी हुई कि अभी तो 10 बज रहे थे, इतनी जल्दी आधी रात पार हो गयी और पता भी ना चला| समय कि गति को देख धीरे धीरे सारी पुरानी बातें ज़हन में आने लगी| वह सारी बातें जो कि लगती है मानों अभी अभी तो गुजरी हो| बीते 10-12 साल तो मानों जुबानी याद हो| साल 2003 में हुए वर्ल्ड कप कि बात करू तो उस दिन इंडिया और पाकिस्तान का मैच टीवी पर आने वाला था| उस वक़्त तक मुझे क्रिकेट से उतना लगाव नहीं था पर पापा और बाबा बहुत जोश में थे| दिन में किसी शार्ट सर्किट से हमारा टीवी ख़राब हो गया था| आनन-फानन में उसे ठीक करने को पापा किसी मिस्त्री को पकड़ कर लाये| चुकि भारत और पाकिस्तान का मैच था तो टीवी ठीक करने वाले ने भी बोल दिया कि आज तो नहीं बन पायेगा साहब, बहुत खराबी है| बस फिर क्या था, पापा ने ना आव देखा ना ताव और पहुँच गये एक नया टीवी खरीदने| 1 मार्च 2003, भारत-पाकिस्तान का मैच और इसी दिन मेरी बड़ी बहन का बर्थडे, पापा घर में हमारा पहला रंगीन और रिमोट से चलने वाला टीवी ले आये| माँ और दादी यह सोच कर खुश थे की सीरियल और अच्छे से देख पायेंगे| मैं और नैना दी अक्सर रिमोट हाथ में लेने को झगड़ा करते थे, रिमोट जिसके हाथ होती, टीवी पर उसका राज़ चलता|

अगस्त 2004, मेरे बाबा कि डेथ हुई थी| सब बहुत उदास थे| घर में लोगों का जमावड़ा लगा था| शायद तेहरवी थी उस दिन, मैं घर के बाहर बैठा था के अचानक घर के सामने से एक बांसुरी वाला कोई धुन बजाते बजाते निकला| मैंने उसे बुलाया और बांसुरी दिखाने को कहा| उसने मुझे सीधी वाली बांसुरी निकाल कर दी और 5 रुपये मांगे| तभी मेरी नज़र सबसे ऊपर लगी टेढ़ी वाली बांसुरी पर गयी| मैंने कृष्णा सीरियल में देखा था कृष्ण इसी तरह की बांसुरी बजाते है| मैंने उसे वो बांसुरी देने को कहा तो उसने भोजपुरी में कहा “ बेटा ई तोहरा से ना बाजी, एकरा ला बहुते सांस चाही”| चुकि मेरे घर में कभी भी हमलोगों से भोजपुरी में बात नहीं की जाती थी तो मुझे बोलने भी नहीं आती थी, फिर भी मैंने कहा “ तोहरा से जो बोल रहे तानी वही द, बाकी हम देख लेब”| उसने उस बांसुरी के 30 रुपये मांगे, मेरे पास 25 ही थे तो उसी में बात बनी| इस तरह मैंने अपनी पहली बांसुरी हाथ में ली थी| उस वक़्त मुझे या मेरे घरवालों को बिलकुल नहीं पता था कि बाद में लोग मुझे इसी चीज़ के लिए जान ने लग जायेंगे| मुझे अच्छी तरह याद है शुरू शुरू में मैं दीदी से इसे बजाने के लिए कितना डांट खाता था| उस वक़्त यह बजती नहीं थी मुझसे और मैं जबरदस्ती बेसुरा ही सही पर बजाया करता था| देखते देखते कुछ साल और बीत गये|

साल 2007, बोर्ड्स के एग्जाम थे मेरे| सच बोलू तो मुझे कुछ समझ नहीं आता था उस वक़्त| एग्जाम दिया और दिल्ली चला गया दीदी के बाद| वहां बैठ कर यह सोचने लगा के अब आगे क्या करना है| कुछ दिनों बाद रिजल्ट्स आये और पता चला मैं सेकंड डिवीज़न में 54% से पास हुआ| मेरे सारे फ्रेंड्स को फर्स्ट डिवीज़न और उसमे भी बहुत अच्छे नंबर आये थे| मुझे समझ नहीं आ रहा था की क्या करू| उसी दिन मेरी माँ ने मुझे फ़ोन किया और ख़ुशी के मारे रोने लगी| मुझे इस बात का दुःख था कि मुझे सेकंड डिवीज़न आया है, और उन्हें इस बात कि ख़ुशी थी कि उनका बेटा पास कर गया| खैर, इस मार्क्स पर मेरा दिल्ली में कुछ नहीं होना था तो चुपचाप मोतिहारी आ गया| लोगों ने कहा साइंस ले लो बेटा आगे इंजीनियरिंग कि पढाई करना| पापा ने कहा जो भी पढाई करना बस सोच समझ कर करना| एडमिशन लिया कॉमर्स में|

साल 2008, मैं अपने कुछ फ्रेंड्स के साथ एक मैच खेलने कॉलेज ग्राउंड पर गया था| मैच में मैंने बोलिंग की और 3 बोल्ड मारे| मैच के बाद एक आदमी मेरे पास आया और बोला “कल सुबह सर्विस स्पोर्ट्स क्लब के ग्राउंड पर आ जाना”| लोगों ने बताया वो आदमी हमारे शहर और डिस्ट्रीक्ट की क्रिकेट टीम का कैप्टेन है| अगले दिन मैं सुबह सुबह ग्राउंड पर पहुँच गया| पहली बार असली क्रिकेट बॉल को हाथ में लेने का मौका मिला| कुछ दिन तक क्लब कि तरफ से खेला और फिर डिस्ट्रीक्ट फिर स्टेट लेवल पर खेलने लगा| गलती से ओपनिंग बॉलर था मैं| पेपर में नाम आने लगे और कुछ अपने दोस्त इस वजह से दूर जाने लगे|

साल 2009, मेरे 12th बोर्ड्स एग्जाम| मुझे एक बात याद थी बस, सेकेण्ड डिवीज़न लाने पर भी माँ ख़ुशी से रो रही थी| इस बार मैंने एग्जाम दिया और फिर दिल्ली चला गया| वहां बैठ रिजल्ट का वेट करने लगा| इस बार रिजल्ट आया, माँ फिर से खुश थी और साथ में मैं भी| फर्स्ट डिवीज़न और 5 में से 4 सब्जेक्ट्स में मुझे डिस्टिंक्शन मिले थे| तय हुआ दिल्ली यूनिवर्सिटी से कॉमर्स में एडमिशन लूं| पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में कॉमर्स में एडमिशन मिलना इतना भी आसान नहीं था| दूसरी लिस्ट में ही एडमिशन फुल और मेरा नंबर ना आया| थक हार कर इकोनॉमिक्स में एडमिशन लेने पंहुचा| जिस वक़्त फ़ी जमा कराने की लाइन में तीसरे नंबर पर खड़ा था, एक महानुभव का कॉल आया| बोलने लगे इकोनॉमिक्स बहुत मुश्किल है और यहाँ बहुत मुश्किल से इसमें पास होते है| बेचारे ने अपने जमाने में 55% पर कॉलेज में टॉप किया था| मुझे नहीं पता क्या हुआ, लाइन से निकल कर वापस मुनिरका की बस पकड़ ली| फिर से मोतिहारी के कॉलेज में पढना लिखा था| पर इस बार कंपनी सेकेर्ट्री का भी तमगा लगने वाला था की इकोनॉमिक्स में बैक के कारण यह भी रुक गयी, और अभी तक रुकी ही हुई है|

 

साल 2010, इस वक़्त तक मैं बांसुरी में कुछ हद तक सुधार कर चूका था| शास्त्रीय भी सीखना शुरू कर दिया था| पता चला सरकार कोई यूथ फेस्टिवल करा रही है| मैंने क्लासिकल इंस्ट्रूमेंट में भाग लिया| चुकि उस वक़्त शहर में मैं अकेला था तो मुझे ही फर्स्ट प्राइज मिला| स्टेट लेवल पर गया तो पता चला मुझे मिलाकर कुल 33 महारथी अलग अलग जगह से पहुचे हुए है| खैर मैंने भी भाग लिया और मुझे राज्य में दूसरा स्थान मिला| अगले 2 साल मैंने फिर भाग लिया और स्टेट चैंपियन बना| इंडिया में अलग आलग जगहों पर जाकर परफॉर्म किया| इस वक़्त तक मैं बिहार में जाना जाने लगा था| नाम हुआ, पैसा हुआ और इज्ज़त भी हुई|

कुछ साल और बीते| मेरा सिलेक्शन National institute of event management, Pune and Ahmedabad के लिए हो गया था| मुझे स्कालरशिप भी मिली थी, पर कुछ कारणों से मैं एडमिशन नहीं ले पाया था| गलती से CUCET का एग्जाम दिया था| लिस्ट में नाम देखा, फी इतनी कम देखा, सामान उठाया और पहुँच गया| यहाँ भी नेशनल टॉपर के रूप में स्कालरशिप मिलने लगी| मैंने कभी भी अपनी कॉलेज लाइफ एन्जॉय नहीं किया था, यहाँ आके सब कुछ जी लिया| अच्छे दोस्त मिले, कुछ तो बहुत अच्छे और कुछ तो सबसे अच्छे मिले|

पर फिर बात वही आकर थम गयी जहाँ से शुरू हुई थी| कैसे 2 साल बीत गये पता हे न चला| ऐसा लगता है मानो कल हे तो आये हो और कल ही तो सबसे खुद को मिलवाया हो| कल ही तो ऑडिटोरियम में इंडक्शन प्रोग्राम हुआ हो और कल ही तो मैंने उसमे बांसुरी बजाई हो|

यहाँ की बातें कभी किसी और दिन होंगी, अभी तो इसी कल को ज़हन में रखना है|