फिल्में, मनोरंजन का
एक साधन| जब अपने पसंदीदा हीरो या हीरोइन की कोई भी नयी फिल्म आने वाली होती है तो
उसका इंतजार बहुत पहले से ही शुरू हो जाता है| फिल्म सिनेमाघर में लगती है, लोग
जाते है और फिर निकलते वक़्त उस फिल्म का कोई सीन डिस्कस कर रहे होते है या कहानी
पर आपनी-अपनी राय दे रहे होते है|
अक्सर कुछ फिल्मों
को देख ऐसा लगता है मानों उनकी कहानियाँ हमारी ही जिंदगी के पन्नो से चुराई गयी हो
जिनपर सिर्फ और सिर्फ हमारा ही कॉपीराइट हो| कितनी बार मैंने दुसरो से सुना है कि
मुझे वह फिल्म सिर्फ इसलिए पसंद है क्योंकि मेरी जिंदगी के कुछ हिस्से उस फिल्म
में दिखाए गये है| ऐसी कितनी ही बातें जो मैं सोचता हूँ पर बयाँ नहीं कर सकता, फिल्में
कितनी आसानी से दिखा जाती है और जब दिखाती है तब मैं सोचता हूँ, क्या ये इत्तेफाक
है| जहाँ और लोग बहुत ही मजे और चाव से किसी फिल्म को देखते है और ठहाके लगाते है
वही दूसरी ओर कोई एक इंसान अचम्भे और सोच में बैठा रहता है की मानो उसकी जिंदगी उसी
के सामने बड़े परदे पर चल रही हो| ये भी एक अजीब बात ही है की जब कभी भी कोई इन्सान
कोई बड़ी बात करता है तब हम ही उससे कहते है “ज्यादा फिल्में देखता है तो डायलोग मारना
सीख गया है”| डायलोग क्या होते है और क्यों होते है, क्या फिल्मों में जो बातें
होती है हमारी निजी जिंदगी से नहीं जुडी होती? चलिए, आपको लेकर चलता हूँ एक ऐसी
कहानी की तरफ जो लगती तो रील की है पर है शुद्ध रियल|
यह कहानी है मनोज
की, मेरा एक जानकार| लम्बा है, साँवला है, भूरी आँखें हैं और मस्तानी चाल| मनोज
अपनी धुन में रहने वाला और जिंदगी को अपने ही अंदाज़ में जीने वाला लड़का है| उम्र
होगी करीबन कोई 23 साल| उसकी एक खासियत है, दुनिया क्या बोलती है उसे कोई फर्क
नहीं पड़ता| घर उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के पुराने मोहल्ले में बसा है और दिल
दुनिया को देखने की चाह में| घर में बाबा, माँ, एक भाई है और हाँ, साथ में एक छोटा
लड़का भी है जो उनके घर रह कर पढता है| मनोज कोई बहुत रईस खानदान से नहीं है और ना
ही उसके बाबा कोई बहुत पैसे वाले है पर फिर भी लोगों में उनकी एक अच्छी पकड़ है| उसके
बाबा कहते है उन्होंने पैसे नहीं कमाए है पर इज्ज़त जरूर कमाई है| जब मनोज छोटा था
तब उसके बाबा लखनऊ में एक बहुत बड़ी कंपनी में काम करते थे| मनोज अपने भाई के साथ
लखनऊ के ही स्कूल में पढता था| फिर एक दिन मनोज के बाबा अपने पिता के कहने पर लखनऊ
छोड़ फैजाबाद में आकर बस गये| चुकि बाबा लखनऊ में एक बड़ी पोस्ट पर थे, फैजाबाद में उन्हें
वह पोस्ट नहीं मिल पा रही थी| थकहार कर उन्होंने फैजाबाद मे ही कम सैलरी पर एक
कंपनी ज्वाइन कर ली| मनोज और उसके भाई का एडमिशन फैजाबाद के ही किसी स्कूल में करा
दिया गया| लखनऊ और फैजाबाद के बच्चों में बहुत अंतर था| उसे यहाँ दुसरे बच्चों से
घुलने मिलने में बहुत परेशानी हो रही थी| मनोज अपनी माँ से अक्सर कहता था की उसे
यहाँ की बातें समझ नहीं आती| पढाई में भी ध्यान नहीं लगा पा रहा था| नतीजा यह हुआ
की, 4 साल हर एग्जाम में सबसे कम मार्क्स आये| 2 बार फाइनल एग्जाम में फेल किया पर
उसके बाबा के कहने पर प्रिंसिपल ने अगली क्लास में बैठने दिया| वह हमेशा खामोश रहा
करता था| उसे चीजों को समझने में बहुत मुश्किलें आ रही थी
घर पर भी कुछ ख़ास
ठीक हालात नहीं थे| मनोज के बाबा एक कंपनी को छोड़ दुसरे और फिर उसे छोड़ किसी तीसरे
कंपनी को ज्वाइन कर लेते| अब तो बस यही सुनने को मिलता था की बस कुछ दिन और फिर सब
ठीक हो जाएगा| दिन बीते फिर महीने और फिर साल, परिस्थति थोड़ी ठीक होती दिखती की दूसरी
प्रॉब्लम अपना मूह फाड़ कर खडी हो जाती| घर के बगल में जिनका घर था मनोज अक्सर उनके
घर जाया करता था| एक बार उस घर में कुछ रूपए गायब हुए, शक की सीधी सुई मनोज की तरफ
जा कर रुक गयी| कुछ लोगों ने इस बात की शिकायत मनोज के बाबा से कर दी और बाबा ने
बिना कुछ जाने समझे मनोज को मारना शुरू कर दिया| मनोज कहता रहा उसने कुछ नहीं किया
पर उसकी एक न सुनी गयी| अगले कुछ महीनो तक यह सिलसिला सा बन गया था उसके साथ| कुछ
भी होता, गलती किसी की भी होती, सजा का हकदार सिर्फ मनोज होता| उसके घर में कोई
शादी थी शायद, बाहर से कुछ मेहमान आये थे| मनोज ने अपने किसी रिश्तेदार को किसी
बात पर चिल्ला कर बोल दिया था, अगले ही दिन उस रिश्तेदार ने किसी झूठी बात पर मनोज
की शिकायत उसके बाबा से कर दी| रिश्तेदारों से भरे घर में, बीच आँगन में उसे बहुत
बुरी तरह मारा गया था| शायद मनोज के बाबा और माँ को इस तरह की सजा इसलिए पसंद थी
कि आगे चलकर मनोज कोई गलती ना करे| पर एक वैध सजा के लिए वैध गलती का भी होना बहुत
जरूरी है| ऐसा नहीं था मनोज का परिवार उससे प्यार नहीं करता था| पर जब कभी भी ऐसी
बातें होती थी तब उसके बाबा को लगता था मनोज कही गलत रास्ते पर ना चला जाए| इसलिए
गलती की सजा तुरंत ही दे दी जाती थी| पर यह कौन सी सजा थी जिसकी गलती का ही पता न
था| खैर, दिन बीतते चले गये और साथ ही साथ मनोज ने लोगों को पहचानना शुरू कर दिया|
उसे अब पता था रिश्ते उन्ही से निभाये जा सकते थे जो रिश्तों को महसूस करता हो| घर
में इतनी पैसों कि कमी को देख मनोज ने पैसों को भी तवज्जो देना छोड़ दिया था| मनोज
ने फुटबॉल क्लब ज्वाइन कर लिया था| उसका सिलेक्शन फैजाबाद की फुटबॉल टीम के लिए कर
लिया गया| धीरे धीरे घर की प्रोब्लेम्स भी कम होती चली गयी| मनोज ने कम उम्र में
ही फुटबॉल में अपना अच्छा नाम कमा लिया था| साथ ही साथ मनोज को चित्रकारी का भी शौक
था| लोगों ने आगे बढने का प्रोत्साहन दिया तो मनोज ने अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी
लगाई जिसे लोगों ने बहुत सराहा| बड़े बड़े अखबार मनोज के बारे में छापने लगे| उसकी
एक एक पेंटिंग 10 से 15 हजार तक बिकने लगी| मनोज ने महसूस किया की कल तक जो
रिश्तेदार उससे नफरत करते या उसे पसंद नहीं करते थे , वही आज दूसरों से मनोज का
परिचय कराते वक़्त फक्र किया करते थे| इस वक़्त तक मनोज एक मस्त मौला लड़का बन चूका
था| लोग उसकी तरफ आकर्षित होने लगे थे| आपनी बातों से अकसर वो लोगो को हसाया करता
था|
अपना ग्रेजुएशन खत्म
होने पर मनोज अलाहाबाद में आगे की पढाई करने आ गया| अलाहाबाद के लोग अपने ठाट-बाट और
बोली के लिए काफी जाने चाहते है| चुकि हर तरफ बैंक में नौकरी को ले घमाशान युद्ध
छिड़ा था| मनोज ने भी बैंक की तैयारी के लिए किसी क्लास में एडमिशन ले लिया| क्लास
में पढाई के लिए कम और मस्ती कए लिए ज्यादा जाना जाता था वह| एक दिन मनोज को लगा
उससे इस भेडचाल में काम नहीं होगा| उसने वह क्लास छोड़ दी| अलाहाबाद में ही उसकी
मुलाकात एक आदमी से हुई| वह मनोज से काफी ज्यादा प्रभावित हुआ और साथ काम करने का
ऑफर दिया| मनोज को शायद इसी वक़्त का इंतजार था| मनोज उस इन्सान के साथ इवेंट में
काम करने लगा| कुछ दिन वहां काम करने के बाद मनोज को रेडियो पर काम करने का ऑफर
आया| मनोज ने उस कंपनी को छोड़ रेडियो चैनल ज्वाइन कर लिया और उनके लिए लिखने लगा| मनोज
को घुमने का बहुत शौक था| वह हमेशा इस शहर से उस शहर करता रहता| उसके लिए लोगों को
समझना और नई चीज़ों को जान ना बहुत जरुरी सा काम था| मनोज ने अपना एक ग्रुप भी
बनाया था जिनके साथ मिलकर वह नुक्कड़ नाटक किया करता था| चुकि चित्रकार था तो
फैजाबाद की कल्चरल कमिटी का भी मेम्बर बना दिया गया था| एक गर्लफ्रेंड भी बनी थी
उसकी पर ज्यादा दिन तक चला नहीं था रिश्ता उससे उसका| मनोज को यकीन था की रिश्तों
को महसूस करने से ही रिश्ता चलता है| वह सब को साथ ले कर चलने पर यकीन रखता था| मनोज
और उसके परिवार की लाइफ में अब सब कुछ ठीक चल रहा था की फिर से एक बात ने मनोज को
जकड लिया| मनोज को अक्सर सीने में दर्द रहता था पर उसने कभी भी इस बात पर ध्यान
नहीं दिया| एक दिन उसने जब डॉक्टर को दिखाया तब उसे पता चला की उसके सीने में दर्द
का कारण एक बिमारी थी| उसने पूरा चेक अप कराया तब पता चला की यह बिमारी उसके लिए खतरनाक
हो सकती है| मनोज को दौड़ना और थका देने वाले कामों को करने से मना कर दिया गया था|
मनोज ने सोचा की इस बिमारी का जिक्र घर पर ना किया जाए| देखते देखते 3 साल निकल
गये, बिमारी और ज्यादा बढ़ गयी और साथ ही उसकी जिंदगी जीने का अंदाज़ भी| वह आगे की
पढाई के लिए भोपाल चला गया| इतने सालों में उसने अब तक अपने घर वालों को अपनी
बिमारी के बारे में नहीं बताया था| मनोज ने कभी भी अपने कॉलेज लाइफ को एन्जॉय नहीं
किया था, पर भोपाल आने के बाद उसने यह कसर भी पूरी कर ली| भोपाल में उसे बहुत अच्छे
लोग मिले| ऐसे लोग जिन्होंने उसे जिंदगी को नये सिरे से जीना सिखाया|
अभी हाल ही में मनोज
से बात हुई, पता चला की बिमारी ने अपने पैर थोड़े और पसार लिए है| घूमना वह छोड़ना
नहीं चाहता क्योंकि कल क्या हो जाए उसे नहीं पता और फिर बिस्तर पर बैठ कर किसी चीज़
पर रिग्रेट नहीं करना चाहता| मनोज कुछ दिन बाद अपने इलाज़ के लिए केरल जा रहा, जहा
उसे हर्बल ट्रीटमेंट दिया जाएगा| मनोज ने अभी तक अपने घर वालों को अपनी बिमारी के
बारे में नहीं बताया है|
जब भी उसकी स्टोरी
के बारे में सोचता हूँ, ऐसा लगता है फिल्मों में हम अक्सर ऐसी स्टोरी देखते है
जिसमे करैक्टर बुरे हालात को पार करते हुए कामयाबी को हासिल करता है और फिर कुछ
ऐसा होता है जो उसकी पूरी जिंदगी बदलने का मद्दा रखती हो|
बहुत से लोग है जो मनोज
की ही तरह जीना चाहते है, पर मेरी नज़र में मनोज की लाइफ को जीना बहुत मुश्किल है| वो
कहते है ना “जो इंसान ऊपर से जितना ज्यादा खुश और जिंदादिल होता है, अन्दर से उतना
ही डरा होता है”| मनोज के बारे में सोच मुझे ऐसा ही लगता है|