Tuesday, March 24, 2015

मानों कल ही की तो बात है


बालकनी में बैठ कर कुछ पढ़ने की कोशिश कर रहा था, किसी काम से साइड में रखे मोबाइल को हाथ में लिया तो दंग रह गया| डिस्प्ले पर समय रात के 2 बजे का दिखा रहा था| हैरानी हुई कि अभी तो 10 बज रहे थे, इतनी जल्दी आधी रात पार हो गयी और पता भी ना चला| समय कि गति को देख धीरे धीरे सारी पुरानी बातें ज़हन में आने लगी| वह सारी बातें जो कि लगती है मानों अभी अभी तो गुजरी हो| बीते 10-12 साल तो मानों जुबानी याद हो| साल 2003 में हुए वर्ल्ड कप कि बात करू तो उस दिन इंडिया और पाकिस्तान का मैच टीवी पर आने वाला था| उस वक़्त तक मुझे क्रिकेट से उतना लगाव नहीं था पर पापा और बाबा बहुत जोश में थे| दिन में किसी शार्ट सर्किट से हमारा टीवी ख़राब हो गया था| आनन-फानन में उसे ठीक करने को पापा किसी मिस्त्री को पकड़ कर लाये| चुकि भारत और पाकिस्तान का मैच था तो टीवी ठीक करने वाले ने भी बोल दिया कि आज तो नहीं बन पायेगा साहब, बहुत खराबी है| बस फिर क्या था, पापा ने ना आव देखा ना ताव और पहुँच गये एक नया टीवी खरीदने| 1 मार्च 2003, भारत-पाकिस्तान का मैच और इसी दिन मेरी बड़ी बहन का बर्थडे, पापा घर में हमारा पहला रंगीन और रिमोट से चलने वाला टीवी ले आये| माँ और दादी यह सोच कर खुश थे की सीरियल और अच्छे से देख पायेंगे| मैं और नैना दी अक्सर रिमोट हाथ में लेने को झगड़ा करते थे, रिमोट जिसके हाथ होती, टीवी पर उसका राज़ चलता|

अगस्त 2004, मेरे बाबा कि डेथ हुई थी| सब बहुत उदास थे| घर में लोगों का जमावड़ा लगा था| शायद तेहरवी थी उस दिन, मैं घर के बाहर बैठा था के अचानक घर के सामने से एक बांसुरी वाला कोई धुन बजाते बजाते निकला| मैंने उसे बुलाया और बांसुरी दिखाने को कहा| उसने मुझे सीधी वाली बांसुरी निकाल कर दी और 5 रुपये मांगे| तभी मेरी नज़र सबसे ऊपर लगी टेढ़ी वाली बांसुरी पर गयी| मैंने कृष्णा सीरियल में देखा था कृष्ण इसी तरह की बांसुरी बजाते है| मैंने उसे वो बांसुरी देने को कहा तो उसने भोजपुरी में कहा “ बेटा ई तोहरा से ना बाजी, एकरा ला बहुते सांस चाही”| चुकि मेरे घर में कभी भी हमलोगों से भोजपुरी में बात नहीं की जाती थी तो मुझे बोलने भी नहीं आती थी, फिर भी मैंने कहा “ तोहरा से जो बोल रहे तानी वही द, बाकी हम देख लेब”| उसने उस बांसुरी के 30 रुपये मांगे, मेरे पास 25 ही थे तो उसी में बात बनी| इस तरह मैंने अपनी पहली बांसुरी हाथ में ली थी| उस वक़्त मुझे या मेरे घरवालों को बिलकुल नहीं पता था कि बाद में लोग मुझे इसी चीज़ के लिए जान ने लग जायेंगे| मुझे अच्छी तरह याद है शुरू शुरू में मैं दीदी से इसे बजाने के लिए कितना डांट खाता था| उस वक़्त यह बजती नहीं थी मुझसे और मैं जबरदस्ती बेसुरा ही सही पर बजाया करता था| देखते देखते कुछ साल और बीत गये|

साल 2007, बोर्ड्स के एग्जाम थे मेरे| सच बोलू तो मुझे कुछ समझ नहीं आता था उस वक़्त| एग्जाम दिया और दिल्ली चला गया दीदी के बाद| वहां बैठ कर यह सोचने लगा के अब आगे क्या करना है| कुछ दिनों बाद रिजल्ट्स आये और पता चला मैं सेकंड डिवीज़न में 54% से पास हुआ| मेरे सारे फ्रेंड्स को फर्स्ट डिवीज़न और उसमे भी बहुत अच्छे नंबर आये थे| मुझे समझ नहीं आ रहा था की क्या करू| उसी दिन मेरी माँ ने मुझे फ़ोन किया और ख़ुशी के मारे रोने लगी| मुझे इस बात का दुःख था कि मुझे सेकंड डिवीज़न आया है, और उन्हें इस बात कि ख़ुशी थी कि उनका बेटा पास कर गया| खैर, इस मार्क्स पर मेरा दिल्ली में कुछ नहीं होना था तो चुपचाप मोतिहारी आ गया| लोगों ने कहा साइंस ले लो बेटा आगे इंजीनियरिंग कि पढाई करना| पापा ने कहा जो भी पढाई करना बस सोच समझ कर करना| एडमिशन लिया कॉमर्स में|

साल 2008, मैं अपने कुछ फ्रेंड्स के साथ एक मैच खेलने कॉलेज ग्राउंड पर गया था| मैच में मैंने बोलिंग की और 3 बोल्ड मारे| मैच के बाद एक आदमी मेरे पास आया और बोला “कल सुबह सर्विस स्पोर्ट्स क्लब के ग्राउंड पर आ जाना”| लोगों ने बताया वो आदमी हमारे शहर और डिस्ट्रीक्ट की क्रिकेट टीम का कैप्टेन है| अगले दिन मैं सुबह सुबह ग्राउंड पर पहुँच गया| पहली बार असली क्रिकेट बॉल को हाथ में लेने का मौका मिला| कुछ दिन तक क्लब कि तरफ से खेला और फिर डिस्ट्रीक्ट फिर स्टेट लेवल पर खेलने लगा| गलती से ओपनिंग बॉलर था मैं| पेपर में नाम आने लगे और कुछ अपने दोस्त इस वजह से दूर जाने लगे|

साल 2009, मेरे 12th बोर्ड्स एग्जाम| मुझे एक बात याद थी बस, सेकेण्ड डिवीज़न लाने पर भी माँ ख़ुशी से रो रही थी| इस बार मैंने एग्जाम दिया और फिर दिल्ली चला गया| वहां बैठ रिजल्ट का वेट करने लगा| इस बार रिजल्ट आया, माँ फिर से खुश थी और साथ में मैं भी| फर्स्ट डिवीज़न और 5 में से 4 सब्जेक्ट्स में मुझे डिस्टिंक्शन मिले थे| तय हुआ दिल्ली यूनिवर्सिटी से कॉमर्स में एडमिशन लूं| पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में कॉमर्स में एडमिशन मिलना इतना भी आसान नहीं था| दूसरी लिस्ट में ही एडमिशन फुल और मेरा नंबर ना आया| थक हार कर इकोनॉमिक्स में एडमिशन लेने पंहुचा| जिस वक़्त फ़ी जमा कराने की लाइन में तीसरे नंबर पर खड़ा था, एक महानुभव का कॉल आया| बोलने लगे इकोनॉमिक्स बहुत मुश्किल है और यहाँ बहुत मुश्किल से इसमें पास होते है| बेचारे ने अपने जमाने में 55% पर कॉलेज में टॉप किया था| मुझे नहीं पता क्या हुआ, लाइन से निकल कर वापस मुनिरका की बस पकड़ ली| फिर से मोतिहारी के कॉलेज में पढना लिखा था| पर इस बार कंपनी सेकेर्ट्री का भी तमगा लगने वाला था की इकोनॉमिक्स में बैक के कारण यह भी रुक गयी, और अभी तक रुकी ही हुई है|

 

साल 2010, इस वक़्त तक मैं बांसुरी में कुछ हद तक सुधार कर चूका था| शास्त्रीय भी सीखना शुरू कर दिया था| पता चला सरकार कोई यूथ फेस्टिवल करा रही है| मैंने क्लासिकल इंस्ट्रूमेंट में भाग लिया| चुकि उस वक़्त शहर में मैं अकेला था तो मुझे ही फर्स्ट प्राइज मिला| स्टेट लेवल पर गया तो पता चला मुझे मिलाकर कुल 33 महारथी अलग अलग जगह से पहुचे हुए है| खैर मैंने भी भाग लिया और मुझे राज्य में दूसरा स्थान मिला| अगले 2 साल मैंने फिर भाग लिया और स्टेट चैंपियन बना| इंडिया में अलग आलग जगहों पर जाकर परफॉर्म किया| इस वक़्त तक मैं बिहार में जाना जाने लगा था| नाम हुआ, पैसा हुआ और इज्ज़त भी हुई|

कुछ साल और बीते| मेरा सिलेक्शन National institute of event management, Pune and Ahmedabad के लिए हो गया था| मुझे स्कालरशिप भी मिली थी, पर कुछ कारणों से मैं एडमिशन नहीं ले पाया था| गलती से CUCET का एग्जाम दिया था| लिस्ट में नाम देखा, फी इतनी कम देखा, सामान उठाया और पहुँच गया| यहाँ भी नेशनल टॉपर के रूप में स्कालरशिप मिलने लगी| मैंने कभी भी अपनी कॉलेज लाइफ एन्जॉय नहीं किया था, यहाँ आके सब कुछ जी लिया| अच्छे दोस्त मिले, कुछ तो बहुत अच्छे और कुछ तो सबसे अच्छे मिले|

पर फिर बात वही आकर थम गयी जहाँ से शुरू हुई थी| कैसे 2 साल बीत गये पता हे न चला| ऐसा लगता है मानो कल हे तो आये हो और कल ही तो सबसे खुद को मिलवाया हो| कल ही तो ऑडिटोरियम में इंडक्शन प्रोग्राम हुआ हो और कल ही तो मैंने उसमे बांसुरी बजाई हो|

यहाँ की बातें कभी किसी और दिन होंगी, अभी तो इसी कल को ज़हन में रखना है|

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